सन्दर्भ:
: मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने 242 पृष्ठों का एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए, धार जिले में स्थित विवादित भोजशाला परिसर को देवी वाग्देवी (सरस्वती) को समर्पित एक हिंदू मंदिर घोषित किया।
भोजशाला परिसर के बारें में:
- भोजशाला परिसर 11वीं सदी का एक संरक्षित ऐतिहासिक स्मारक है, जो मूल रूप से संस्कृत सीखने का एक प्रमुख केंद्र और देवी वाग्देवी (सरस्वती) को समर्पित एक मंदिर था।
- सदियों के क्षेत्रीय बदलावों के दौरान, मंदिर की संरचना के कुछ हिस्सों का उपयोग कमल मौला मस्जिद बनाने के लिए किया गया, जिससे यह एक अत्यधिक विवादित धार्मिक स्थल बन गया।
- अवस्थिति:
- ज़िला: धार (ऐतिहासिक रूप से ‘धारा’ के नाम से जाना जाता था), मालवा क्षेत्र, मध्य प्रदेश, भारत।
- भौगोलिक संदर्भ: धार शहर में स्थित, जो प्रसिद्ध परमार राजवंश की राजधानी के रूप में कार्य करता था।
- इतिहास:
- स्थापना (1000–1055 ई.): इसकी स्थापना राजा भोज ने की थी, जो परमार वंश के सबसे प्रसिद्ध सम्राट थे। कला और साहित्य के महान संरक्षक होने के नाते, उन्होंने पूरे भारत से विद्वानों और छात्रों को आकर्षित करने के लिए इस भव्य महाविद्यालय (शाला) की स्थापना की।
- उत्तराधिकारियों का योगदान: इस केंद्र का विस्तार और रखरखाव उदयदित्य और नरवर्मन जैसे उनके तत्काल उत्तराधिकारियों द्वारा किया गया, और बाद में राजा अर्जुनवर्मा देव (13वीं सदी की शुरुआत) ने इसे संरक्षण प्रदान किया।
- इस्लामी रूपांतरण: 14वीं सदी में, मालवा सल्तनत के शासनकाल के दौरान, इस स्थल को एक मस्जिद में बदल दिया गया। यह सूफी संत शेख कमाल मौला की दरगाह से जुड़ गया, जिससे इसकी एक दोहरी पहचान बन गई।
- आधुनिक प्रशासन: मार्च 1904 में, इसे ‘प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम’ के तहत एक संरक्षित स्मारक घोषित किया गया। 2003 के ASI के एक परिपत्र के तहत, एक समझौता व्यवस्था के अंतर्गत हिंदुओं को मंगलवार और बसंत पंचमी के दिन पूजा करने की अनुमति दी गई, जबकि मुसलमानों को शुक्रवार के दिन नमाज़ अदा करने की अनुमति मिली।
- वास्तुशिल्पीय विशेषताएँ:
- मंदिर के खंभे और विन्यास: इस स्मारक में एक विशाल खुला आँगन है, जिसके चारों ओर खंभों की कतारें और एक प्रार्थना कक्ष बना हुआ है। मस्जिद के हर हिस्से में इस्तेमाल किए गए बारीकी से तराशे गए खंभे और सजी हुई छतें, स्पष्ट रूप से हिंदू मंदिर के रूपांकनों और संरचनाओं को दर्शाती हैं।
- सर्पबंध शिलालेख: इस स्थल की एक अनूठी विशेषता यहाँ संरक्षित दो ‘सर्पबंध’ (सर्पाकार आरेख) स्तंभ शिलालेख हैं।
- इनमें से एक में संस्कृत वर्णमाला के साथ-साथ संज्ञा और क्रिया के प्रत्यय (terminations) अंकित हैं, जबकि दूसरे में संस्कृत व्याकरण के दस कालों और मनोभावों (moods) के लिए प्रयुक्त होने वाले व्यक्तिगत प्रत्ययों का आरेख दिया गया है।
- प्राकृत स्तुतियाँ: दीवारों पर पत्थर की ऐसी पट्टियाँ जड़ी हुई हैं, जिन पर प्राकृत भाषा में लिखी गई ‘कूर्म-अवतार’ (भगवान विष्णु का मगरमच्छ/कछुआ अवतार) की दो अलग-अलग स्तुतियाँ उत्कीर्ण हैं।
- शास्त्रीय संस्कृत नाटक: मेहराब (mihrab) के चारों ओर लगी पट्टियों पर एक नाट्य-रचना अंकित है, जिसे राजा अर्जुनवर्मा के शासनकाल के दौरान राजगुरु मदन (जैन विद्वान आशाधर के शिष्य) ने लिखा था।
- खंडित देव-प्रतिमाएँ: ASI के नवीनतम सर्वेक्षण में 94 मूर्तियाँ (जिनमें गणेश, विष्णु और नरसिंह की प्रतिमाएँ भी शामिल हैं) बरामद की गईं; साथ ही, दीवारों के सहारे बने स्तंभों (pilasters) पर उत्कीर्ण, किंतु खंडित संरचनात्मक आकृतियों को भी प्रलेखित किया गया।
