सन्दर्भ:
: भारत का पहला आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) संचालित मानव-हाथी संघर्ष अनुसंधान केंद्र झारखंड के पलामू टाइगर रिज़र्व (PTR) में स्थापित किया जाएगा।
पलामू टाइगर रिज़र्व के बारें में:
- पलामू टाइगर रिज़र्व भारत के झारखंड राज्य में छोटानागपुर पठार क्षेत्र में स्थित एक ऐतिहासिक जैव-विविधता रिज़र्व है। 1947 में शुरू में एक ‘सुरक्षित वन’ (Protected Forest) के रूप में गठित, इसे वैश्विक वन्यजीव संरक्षण में एक अग्रणी दर्जा प्राप्त है, क्योंकि यह 1974 में ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ की शुरुआत के समय बनाए गए मूल 9 टाइगर रिज़र्व में से एक था।
- कुल क्षेत्रफल: 1129.93 वर्ग किमी।
- ज़ोनिंग: इसमें 414.08 वर्ग किमी का एक ‘कोर क्षेत्र’ (Critical Tiger Habitat) शामिल है- जिसमें बेतला राष्ट्रीय उद्यान (226.32 वर्ग किमी) भी आता है और इसके चारों ओर 715.85 वर्ग किमी का एक ‘बफर क्षेत्र’ है।
- AI रिसर्च सेंटर का उद्देश्य:
- मशीन लर्निंग का इस्तेमाल करके हाथियों द्वारा भोजन की तलाश, खतरे या बच्चे को जन्म देने के दौरान निकाली जाने वाली खास आवाज़ों और खतरे के संकेतों को समझना।
- AI का इस्तेमाल करके हाथियों के मौसम के हिसाब से आने-जाने के रास्तों और उनके व्यवहार के तरीकों पर नज़र रखना, ताकि आस-पास के गाँवों को तुरंत और समय से पहले चेतावनी दी जा सके।
- भारत का पहला मानकीकृत और डेटा-आधारित ढाँचा तैयार करना, जिसमें पाले हुए हाथियों का इस्तेमाल करके हाथियों के झुंड और इंसानों के बीच के मेल-जोल का अध्ययन किया जाएगा और समस्याओं को हल करने वाली रणनीतियाँ बनाई जाएँगी।
- मुख्य भूवैज्ञानिक और पारिस्थितिक विशेषताएँ:
- विशेष भू-भाग और चट्टानें: इस रिज़र्व की मूल भूवैज्ञानिक संरचना में ‘नीस’ (Gneiss) संरचनाओं की प्रधानता है। इसकी जटिल चट्टान-संरचना को विभिन्न चट्टान-समूहों में वर्गीकृत किया गया है:
- लेटराइट समूह: उच्च-स्तरीय लेटराइट संरचनाएँ और जलोढ़ निक्षेप।
- क्वार्टजाइट समूह: इसमें ऑर्थोक्वार्टजाइट, बॉक्साइट, बायोटाइट शिस्ट, डायोपसाइड और पेग्माटाइट शामिल हैं।
- नीस समूह: इसमें हॉर्नब्लेंड-ग्रेनाइट, हॉर्नब्लेंड-नीस और अभ्रकयुक्त/क्वार्टजाइट नीस की प्रधानता है।
- एम्फीबोलाइट और अन्य चट्टानें: इसमें हाइपरस्थीन नीस, गार्नेट, महानदी बलुआ पत्थर, ग्रिट, शेल और हेमेटाइट पाए जाते हैं।
- जलोढ़: नदियों द्वारा जमा की गई गाद, रेत, चिकनी मिट्टी और समृद्ध कार्बनिक पदार्थों की परतें।
- जलवायु और सूखे की संवेदनशीलता: ‘रेन-शैडो ज़ोन’ (वर्षा-छाया क्षेत्र) में स्थित होने के कारण, यह रिज़र्व सूखे की चपेट में आने के लिए अत्यधिक संवेदनशील है। यहाँ तापमान में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है—सर्दियों में न्यूनतम 12°C से लेकर गर्मियों में अधिकतम 50°C तक।
- जल-तंत्र: यह रिज़र्व दो मुख्य बारहमासी नदियों उत्तरी कोयल और बूढ़ा नदी के साथ-साथ औरंगा, सतनादी और सुकरी जैसी मौसमी जलधाराओं से पोषित होता है। बरवाडीह के निकट ‘तारू’ नामक एक अनोखा भूवैज्ञानिक ‘हाफ-लॉक’ झरना बहता है।
- समृद्ध जैव-विविधता: यह रिज़र्व वन्यजीवों के एक विशाल भंडार को संरक्षित करता है, जिसमें 970 पौधों की प्रजातियाँ, 174 पक्षियों की प्रजातियाँ, 17 सरीसृपों की प्रजातियाँ और 56 स्तनधारियों की प्रजातियाँ शामिल हैं; इनमें हाथी, तेंदुआ, गौर, स्लॉथ भालू, भेड़िया और बाघ प्रमुख हैं।
- इसका महत्व:
- भारत में मानव-हाथी संघर्ष प्रबंधन को केवल प्रतिक्रियात्मक उपायों (जैसे हाथ से ढोल बजाना या पटाखे फोड़ना) से हटाकर, AI-समर्थित सक्रिय हस्तक्षेप की ओर ले जाना।
- इन जंगलों का बुनियादी वैज्ञानिक प्रबंधन 1864 में डॉ. एंडरसन के नेतृत्व में शुरू हुआ था, जो PTR को भारतीय वानिकी और वन्यजीव संरक्षण कानूनों का एक जीवंत अभिलेखागार बनाता है।
