सन्दर्भ:
: भले ही पटाखों की एक यूनिट में हुए धमाके में लोगो के हताहत, को देखते हुए त्रिशूर पूरम उत्सव के समारोहों को सीमित कर दिया गया था, फिर भी हाल ही में त्रिशूर शहर में स्थित वडक्कुनाथन मंदिर के मैदान में इस उत्सव को देखने के लिए हज़ारों की संख्या में लोग उमड़ पड़े।
त्रिशूर पूरम के बारे में:
- यह केरल के सबसे लोकप्रिय मंदिर उत्सवों में से एक है।
- यह हर साल मलयालम महीने ‘मेडम’ (अप्रैल-मई) में, त्रिशूर ज़िले के बीचों-बीच स्थित वडक्कुनाथन मंदिर के ‘थेक्किंकाडु मैदानम’ में आयोजित किया जाता है।
- त्रिशूर पूरम का इतिहास 200 साल से भी ज़्यादा पुराना है।
- इसे अक्सर “सभी पूरमों की जननी” कहा जाता है। यह कोचीन के महाराजा (1790–1805) राजा राम वर्मा– जिन्हें ‘शक्तिन थंपुरान’ के नाम से भी जाना जाता है- की ही सोच का नतीजा था।
- यह उत्सव दस मंदिरों को भक्ति और आपसी होड़ के एक शानदार प्रदर्शन में एक साथ जोड़ता है।
- इसमें मुख्य रूप से परमक्कावु भगवती मंदिर और तिरुवंबाडी कृष्ण मंदिर शामिल होते हैं।
- मुख्य आकर्षण:
- हाथियों का जुलूस: 50 से भी ज़्यादा, भव्य रूप से सजे-धजे हाथी ‘पंचवाद्यम’ संगीत और ‘मेलम’ की ताल के बीच मूर्तियों को लेकर चलते हैं।
- कुडमट्टम: विरोधी समूहों के बीच रंग-बिरंगी छतरियों का रोमांचक आदान-प्रदान, जिसमें उनकी कुशलता और कलात्मकता की झलक मिलती है।
- आतिशबाजी का नज़ारा: आधी रात को होने वाली इस आतिशबाजी में आसमान में फूटने वाले और ज़मीन पर होने वाले आतिशबाजी के नज़ारे शामिल होते हैं, जो कई घंटों तक चलते हैं।
- पंचप्रदक्षिणाम: देवी-देवता एक पवित्र अनुष्ठान के तहत प्राचीन वडक्कुनाथन मंदिर की परिक्रमा करते हैं।
- इलंजीथारा मेलम: पारंपरिक वाद्ययंत्रों की एक मंत्रमुग्ध कर देने वाली प्रस्तुति।
