सन्दर्भ:
: मध्य प्रदेश के झाबुआ ज़िले के बोरपाड़ा गाँव में, निवासियों ने एक सार्वजनिक कुएँ की सफ़ाई और मरम्मत के लिए भील हलमा परंपरा को पुनर्जीवित किया।
हलमा परंपरा के बारे में:
- हलमा मध्य प्रदेश के भील आदिवासी समुदाय द्वारा निभाई जाने वाली एक पुरानी सामूहिक परंपरा है।
- इसका सीधा अर्थ है: बिना किसी मज़दूरी या अनुबंध के, आपसी दायित्व और अपनेपन की भावना से प्रेरित होकर, मिलकर काम करना।
- अपने मूल रूप में, हलमा स्वैच्छिक सामूहिक श्रम की एक गहरी परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है।
- इस परंपरा की जड़ें उस युग तक फैली हुई हैं, जब इन समुदायों के पास न तो बड़े संसाधन थे, न ही सरकारी सहायता, और न ही कोई बाज़ार। उनके पास जो था, वह थे- एक-दूसरे का साथ।
- जब किसी व्यक्ति या परिवार के सामने कोई बड़ा काम आता है- चाहे वह घर बनाना हो, खेती की मेड़ों की मरम्मत करना हो, किसी जल-स्रोत को पुनर्जीवित करना हो, या कोई बड़ा सामुदायिक आयोजन करना हो- तो वे ‘हलमा’ का आह्वान करते हैं।
- इसके जवाब में, समुदाय के दर्जनों- और कभी-कभी सैकड़ों- सदस्य इकट्ठा होते हैं; वे अपने औज़ार, भोजन और श्रम साथ लाते हैं, और तब तक मिलकर काम करते हैं, जब तक कि वह काम पूरा नहीं हो जाता।
- इसमें न तो कोई औपचारिक नेता होता है, और न ही कोई बड़ी घोषणा, इसमें बस काम होता है- जो सब मिलकर, कंधे से कंधा मिलाकर करते हैं।
- इसमें किसी भी प्रकार के आर्थिक पारिश्रमिक की अपेक्षा नहीं की जाती, इसमें भागीदारी किसी बाहरी सत्ता द्वारा थोपे गए दायित्व के कारण नहीं होती, बल्कि यह नैतिक प्रतिबद्धता, पूर्वजों के मूल्यों और इस भरोसे से प्रेरित होती है कि जब भी ज़रूरत पड़ेगी, तो यह मदद उन्हें भी वापस मिलेगी।
- हाल के वर्षों में, हलमा परंपरा को फिर से पुनर्जीवित किया गया है, ताकि कुछ साझा चुनौतियों का सामना किया जा सके, जैसे:
- पारंपरिक जल-स्रोतों का जीर्णोद्धार
- बंजर पहाड़ियों पर वृक्षारोपण
- वर्षा जल संरक्षण के लिए ‘कंटूर ट्रेंच’ (जल-संग्रह खाइयाँ) का निर्माण
- जैव विविधता और मृदा स्वास्थ्य का पुनरुद्धार
