सन्दर्भ:
: हाल ही में, स्पीति के सीबकथॉर्न को भौगोलिक संकेत (जीआई) टैग का दर्जा दिया गया है।
सीबकथॉर्न के बारे में:
- इसे आम तौर पर ‘वंडर प्लांट’, ‘लद्दाख गोल्ड’, ‘गोल्डन बुश’ या ठंडे रेगिस्तानों की ‘गोल्ड माइन’ (सोने की खदान) के नाम से जाना जाता है।
- यह ट्रांस-हिमालयी क्षेत्र का एक महत्वपूर्ण पौधा है जो ‘एलेग्नेसी’ (Elaeagnaceae) परिवार से संबंधित है।
- वितरण: सीबकथॉर्न (हिप्पोफे रैम्नोइड्स) पूरे यूरोप और एशिया में पाया जाने वाला पौधा है।
- भारत में, यह हिमालयी क्षेत्र में ‘ट्री लाइन’ (पेड़ उगने की सीमा) से ऊपर, आमतौर पर लद्दाख और स्पीति जैसे ठंडे रेगिस्तानों के सूखे इलाकों में पाया जाता है।
- इसमें छोटे नारंगी या पीले रंग के बेरी (फल) लगते हैं जो स्वाद में खट्टे होते हैं लेकिन विटामिन, खासकर विटामिन-सी से भरपूर होते हैं।
- सीबकथॉर्न बेरी की एक खास बात यह है कि जमा देने वाली ठंड (शून्य से नीचे के तापमान) के बावजूद ये पूरी सर्दियों में झाड़ी पर ही लगे रहते हैं।
- सीबकथॉर्न के लिए जलवायु और मिट्टी की ज़रूरतें:
- यह ठंडे इलाकों (टेम्परेट ज़ोन) में उगने वाली झाड़ी है।
- यह -43 से 40°C तक के तापमान को झेल सकता है। यही खासियत इस प्रजाति को कठोर जलवायु परिस्थितियों में भी अच्छी तरह से ढलने में मदद करती है।
- सीबकथॉर्न की घनी और कांटेदार झाड़ियाँ खारी मिट्टी को भी झेल सकती हैं और इन्हें बढ़ने के लिए भरपूर धूप की ज़रूरत होती है।
- पारिस्थितिक महत्व:
- इस झाड़ी की जड़ें बहुत दूर तक फैलती हैं और इनमें हवा से नाइट्रोजन को सोखकर मिट्टी में मिलाने (नाइट्रोजन फिक्सेशन) की क्षमता होती है।
- ठंडे इलाकों में मिट्टी के कटाव को रोकने, ज़मीन को फिर से उपजाऊ बनाने, जंगली जानवरों के रहने की जगह को बेहतर बनाने और खेतों की सुरक्षा के लिए यह एक बेहतरीन पौधा है।
