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दास एडम स्मिथ प्रॉब्लमदास एडम स्मिथ प्रॉब्लम
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सन्दर्भ:

: ‘द वेल्थ ऑफ़ नेशंस’ की 250वीं वर्षगांठ ने आर्थिक चिंतन में ‘दास एडम स्मिथ प्रॉब्लम’ पर होने वाली बहसों को फिर से जीवित कर दिया है।

दास एडम स्मिथ प्रॉब्लम के बारें में:

  • ‘दास एडम स्मिथ प्रॉब्लम’ (Das Adam Smith Problem) का तात्पर्य ‘द वेल्थ ऑफ़ नेशंस’ में वर्णित ‘स्व-हित‘ और ‘द थ्योरी ऑफ़ मोरल सेंटीमेंट्स‘ में वर्णित ‘नैतिक सहानुभूति’ के बीच प्रतीत होने वाले विरोधाभास से है।
  • आधुनिक विद्वानों का तर्क है कि यह एक गलत व्याख्या है; उनका मानना ​​है कि स्मिथ का दर्शन नैतिकता और अर्थशास्त्र को एक एकीकृत ढाँचे में समाहित करता है।
  • मुख्य विशेषताएं:
    • स्पष्ट विरोधाभास: शुरुआती विद्वानों ने स्मिथ के कार्यों में स्वार्थ (बाजार) और सहानुभूति (नैतिकता) के बीच टकराव देखा।
    • एकीकृत दर्शन: बाद के अर्थशास्त्रियों, जैसे जैकब वाइनर ने तर्क दिया कि दोनों कार्यों का एक ही नैतिक आधार है।
    • ‘अदृश्य हाथ’ की नई व्याख्या: यह अवधारणा व्यक्तिगत कार्यों के सामाजिक रूप से लाभकारी परिणामों को दर्शाती है, न कि केवल शुद्ध स्वार्थ को।
    • आधुनिक प्रासंगिकता: इसे समकालीन पूंजीवाद में स्वार्थ और सामाजिक-हितैषी व्यवहार के बीच संतुलन बनाने के एक प्रतिबिंब के रूप में देखा जाता है।
  • इसका महत्व:
    • नैतिकता और अर्थशास्त्र के बीच सेतु: यह दर्शाता है कि बाजार नैतिक और संस्थागत ढांचों के भीतर कार्य करते हैं, न कि उनसे अलग-थलग होकर।
    • आधुनिक पूंजीवाद की व्याख्या: यह लाभ के उद्देश्यों और जन-कल्याण, नियमन तथा सामाजिक उत्तरदायित्व के सह-अस्तित्व को समझने में मदद करता है।

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By gkvidya

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