सन्दर्भ:
: NITI आयोग ने राजकोषीय स्वास्थ्य सूचकांक 2026 (FHI 2026) का दूसरा वार्षिक संस्करण जारी किया, जो वित्त वर्ष 2023-24 के लिए भारतीय राज्यों के राजकोषीय प्रदर्शन का मूल्यांकन करता है।
FHI 2026 के बारें में:
- राजकोषीय स्वास्थ्य सूचकांक NITI Aayog द्वारा तैयार किया गया एक व्यापक ढांचा है, जिसे भारतीय राज्यों की राजकोषीय सुदृढ़ता का मूल्यांकन और तुलना करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।
- यह केवल घाटे के सामान्य संकेतकों से आगे बढ़कर, राज्यों की राजकोषीय शक्तियों और कमजोरियों का एक व्यवस्थित आकलन प्रस्तुत करता है।
- प्रकाशक: नीति आयोग, भारत सरकार।
- प्रयुक्त मानदंड: यह सूचकांक पाँच मुख्य स्तंभों पर आधारित है:
- व्यय की गुणवत्ता: प्रतिबद्ध व्यय की तुलना में विकासात्मक और पूंजीगत व्यय पर केंद्रित।
- राजस्व जुटाना: आंतरिक कर और गैर-कर राजस्व उत्पन्न करने की क्षमता का मापन।
- राजकोषीय विवेक: घाटा प्रबंधन और FRBM मानदंडों के पालन का मूल्यांकन।
- ऋण सूचकांक: बकाया देनदारियों के आकार और बोझ का मूल्यांकन।
- ऋण वहनीयता: बिना किसी राजकोषीय दबाव के ऋण चुकाने की दीर्घकालिक क्षमता का विश्लेषण।
- रैंकिंग (राज्यवार, 2023-24 के लिए):
- शीर्ष प्रदर्शनकर्ता
- ओडिशा– रैंक 1 (स्कोर: 73.1)
- गोवा– रैंक 2 (स्कोर: 54.7)
- झारखंड– रैंक 3 (स्कोर: 50.5)
- गुजरात– रैंक 4
- महाराष्ट्र– रैंक 5
- सबसे कम प्रदर्शन करने वाले राज्य
- पंजाब– रैंक 18
- आंध्र प्रदेश– रैंक 17
- पश्चिम बंगाल- रैंक 16
- केरल– रैंक 15
- शीर्ष प्रदर्शनकर्ता
- रिपोर्ट का सारांश:
- कवरेज का विस्तार: इस संस्करण ने अपने दायरे का विस्तार करते हुए 10 उत्तर-पूर्वी और हिमालयी राज्यों को इसमें शामिल किया है, और उनकी अनूठी संरचनात्मक तथा भौगोलिक राजकोषीय बाधाओं को मान्यता दी है।
- शीर्ष प्रदर्शन करने वाले: ओडिशा ने स्थिर राजस्व और नियंत्रित घाटे के कारण अपना नेतृत्व बनाए रखा, जबकि अरुणाचल प्रदेश ने उच्च व्यय गुणवत्ता के साथ NE/हिमालयी श्रेणी में शीर्ष स्थान हासिल किया।
- लगातार बना तनाव: पंजाब, केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्य बढ़ते कर्ज, उच्च घाटे और कम राजस्व वृद्धि के कारण लगातार राजकोषीय तनाव का सामना कर रहे हैं।
- व्यय में बदलाव: हाल के वर्षों में कई राज्यों में पूंजीगत व्यय और सामाजिक क्षेत्र पर होने वाले खर्च पर अधिक जोर दिया गया है।
- समष्टि-राजकोषीय जुड़ाव: राज्यों का वित्त अब भारत के सामान्य सरकारी कर्ज का लगभग एक-तिहाई हिस्सा है, जिससे उनकी राजकोषीय सेहत राष्ट्रीय समष्टि-आर्थिक स्थिरता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है।
